बैंकों के बढ़ते चढ़ते नियम के बीच आम आदमी बेहाल

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NO CASH
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बैंकों के बढ़ते असामान्य कानूनों का मसला कई दिनों से चलता आ रहा है, वो चाहे अपने ही पैसे बैंक से निकालने की लंबी कतार हो या पैसे जमा करने की भीड़। 
भारतीय आर्थिक लेखा जोखा में बैंको को एक अहम हिस्सा माना गया है जहाँ तमाम तरह के नगद लेन देन हर रोज़ होते है।
भारतीय आर्थिक व्यवस्था के अनुसार बैंको में पैसे को जमा कर उससे अलग अलग तरीके के फायदे लोगों तक पहुंचाने के लिए सबसे सुरक्षित और प्रभावशाली जगह मानी जाती है जहाँ से लोग जब चाहें पैसे बड़ी आसानी से निकाल सकते हैं, अपने पैसे जमा कर सकते है, उस पैसों को जगह-जगह निवेश कर सकते हैं और अपनी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। 
आज के समय में बैंकों की परिभाषा बदल दी गयी है मसलन, आज के नए असामान्य कानून के अनुसार बैंक वो जगह है जहाँ आपको अपनी समझ-बुझ का भरपूर इस्तेमाल करना होता है और अपने आप को उनके जुर्माना-जाल से बचाना होता है।
आपको जानकर हैरानी होगी और आंकड़े सुनकर ताज़्जुब होगा की के एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2017-18 में 21 पब्लिक और 3 प्राइवेट सेक्टर बैंकों ने मिलकर खाताधारकों से कुल 5,000 करोड़ रुपये का जुर्माना सिर्फ अपना न्यूनतम राशि बैंकों में पोषित न रखने पर लगाया है।
आखिर वो कौन लोग है जो अपना न्यूनतम राशि नहीं बचा पाते और बैंकों के जुर्माना जाल के शिकार बनते हैं, वो और कोई नहीं हमारे ही भारत के किसान, मज़दूर, छोटे व्यापारी, शहरों में पैसे जोड़-जोड़ कर पढ़ने वाले विद्यार्थी, और वो सारे लोग जिनको अपनी न्यूनतम मज़दूरी की राशि तक नही मिलती।
आज डिजिटल इंडिया के दौर में एक बड़ा तबका पीछे छूट गया है.
शहरों के चकाचौंध और बड़े बड़े फ्लाईओवर ने कुछ साइकिल और रिक्शाओं को कहीं छुपा दिया, अच्छा तो खूब लगता है शहर के चकाचौंध में अपने भारत को जगमगाते देखना पर ये बात नहीं भूल सकते कि वो रिक्शा और साइकिल गायब तो हो गए पर वो आज भी कहीं बेरोज़गारी के आलम में ज़िन्दगी बीता रहे हैं।
अच्छा होता कि वो भी इस शहर के चकाचौंध में हमारे साथ घूमते और हम एक साथ रहते।
बैंकों के जुर्माने के छल प्रपंच के बाद जनता जब अपने पैसे निकालने एटीएम की ओर जाती है तो उसे पैसे मिलने से पहले ही एटीएम के दरवाज़े पर एक बड़ा पोस्टर मिलता है जिस पर साफ साफ अक्षरों में लिखा होता है कि ”पैसा समाप्त है”, ”तकनीकी खराबी के कारण एटीएम बन्द है”, ”सर्वर फेल है”, ”2000 से कम कोई नोट उपलब्ध नहीं है” इत्यादि।
इन सब के बावजूद वो लगातार 10 एटीएम की चक्कर लगाता है और तब जाकर उसे एक सामान्य एटीएम मिलता है वो भी लम्बी कतार के साथ। 
इन समस्यायों पर हमारी नज़र तो जाती है पर आज हमें इस बात की इतनी आदत हो चुकी है कि हमें अब याद ही नही की क्या हमारा हक़ है? और क्या सरकार की सरोकार, हमे सबकुछ सामान्य लगने लगा है।
हमारी नज़र इतनी बुज़दिल हो चुकी है की हम उफ़्फ़ तक करने की ज़रूरत नहीं समझते और निकल पड़ते हैं एटीएम की खोज में उस अनंत डगर पर जहाँ अगर बीच में कोई एटीएम दिख जाये तो आँखें ऐसी टिमटिमा उठती हैं की मानो बैंकिंग समस्या से जुड़े सारे हल उस एटीएम के अंदर ही हो, और हम सारी समस्याओं को भूलक्रर चुपचाप पैसे निकाल लेते हैं। आज उस बैंक की नींव को नेताओं ने अपने राजनितिक हित के लिए ऐसा उपयोग किया है की ये अब बस लूटने की एक जगह बन गयी है। 
आज किसान क़र्ज़ माफ़ी के लिए आत्महत्याएं कर रहा है, लोग एटीएम में पैसे की खोज करते भटक रहे हैं, कई अर्थशास्त्री भारत के अर्थव्यवस्था में आपातकालीन स्तिथि को देखतें हैं, इससे और दुखद बात क्या हो सकती है?
पहले लोग घोटालों पर खूब खेद जताते थे और उसे सरकार का निकम्मापन बताया जाता था किन्तु आज इसी बात पर लोग मज़ाकिया मीम (एक तरह का हास्यात्मक चित्र जिसके साथ कुछ मज़ाकिया सन्देश लिखा हो) बना कर सोशल मीडिया पर एक दूसरे के साथ शेयर किया करते हैं।
यह दरअसल सामान्य नहीं बल्कि असामान्य है। हमें मुद्दों को बिलकुल स्पष्ट रखना चाहिए। गौरतलब है कि बैंकों के इतने कठिन नियम केवल गरीबों और मज़दूर वर्ग के लोगों के लिए ही है, अगर नियम सभी के लिए एक समान होता तो शायद  ललित मोदी, नीरव मोदी, संदेसरा ब्रदर्स, विजय माल्या जैसे बड़े-बड़े उद्योगपति बैंक से भारी रकम का क़र्ज़ लेकर फरार नहीं होते। 
सरकार को अपने सरोकार की सूचि में बैंकों को सबसे ऊपर स्थान देनी चाहिए और कड़ी निंदा करने के बजाय कड़ी नज़र रखनी चाहिए।
भारतीय बैंक की हालत बेहद चिंताजनक है, इसमें जल्द ही सुधार की ज़रुरत है, नहीं तो इसकी नींव कमजोर हो जाएगी जिसकी शुरुआत हो चुकी है।
लेखक : अमित आनंद 

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