विश्वास किजिए, कोई बिहार का गला घोंट रहा है।

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MALNUTRITION
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भारत के विशाल नक़्शे पर स्थित बिहार, जिसके पिछड़ेपन का कारण प्राकृतिक नहीं अपितु यहाँ के राजनेताओं के अमानवीय सोच और समाज के तौर तरीके है। बिहार में ऐसे अनेकों साधन उपलब्ध है जिनके सही उपयोग करने पर बिहार अपनी पहचान अव्वल दर्जे के राज्यों के साथ बना सकता है, परन्तु यहाँ का राजनीतिक ढांचा और सामाजिक मतभेदों के कारण बिहार हमेशा से पिछड़े राज्यों में गिना जाता रहा है।

बिहार भारत का सबसे कम साक्षरता वाला राज्य है जिसमें महिला साक्षरता दर और भी कम है और परिणामस्वरुप यहाँ के युवाओं में हुनर होने के बावजूद सही साधन नहीं मिलने पर ये हमेशा पीछे रह जाते हैं।

रोजगार के अवसर पहले ही कम हैं, और समाज के जागरूक न होने के कारण जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, ऐसे में ज़ाहिर है लगातार बढती जनसँख्या बिहार के विकास में बाधा बनी हुई है।

भारत में नदियों का एक अलग ही महत्व है और अलग-अलग जगह इन नदियों से अनेकों तरह के फायदे लिए जाते हैं वहीँ कोसी नदी को बिहार का दुःख कहा जाता है, कारण है हर साल की बाढ जो कि इस राज्य को विकास के क्षेत्र में कई साल पीछे ले जाती है,चाहे वो फसलों के बर्बाद होने से बढ़ती मंहगाई हो या बेघर हो जाने से बढ़ती गरीबी, बिहार आज भी इस प्राकृतिक जल स्त्रोत का सही उपयोग नहीं कर पाया जबकि इस पर बांध निर्माण हजारो टन की बिजली उत्पादन में सहायक हो सकती है, नदी के पानी से खेतों की सिंचाई की जा सकती है फिर भी हर साल बिहार में पानी की कमी की वजह से लाखों की फसल बर्बाद हो जाती है.

बिहार में कानून व्यवस्स्था का ऐसा माहौल है जैसे विदेशी फिल्मों में जॉम्बीज़ हमले के बाद का दृश्य होता है। जहाँ युवाओं को देश के विकास में अपनी योग्यता दिखानी चाहिए वहां योग्यता के नाम पर गुंडागर्दी का चलन बना हुआ है। राजनेता अपने जिम्मेवारियों को भूलकर खुद को गंदी राजनीति से पर्दा कर लिया है और अब ये राजनीति के नाम पर सिर्फ ढकोसलेबाजी करना जानते हैं।
भारत का ऐतिहासिक राज्य बिहार इतिहास के पन्नों में भले ही एक गौरवशाली और सम्पन्न राज्य दिखाई देता हो, परन्तु उसका वर्तमान स्वरूप लोगों के मन में आशा और उल्लास नहीं जगाता। उपजाऊ भूमि, नदियों के जाल और खनिजों के अपार भंडारों के बावजूद बिहार के ज़्यादातर लोग पलायन कर दूसरे राज्यों में बसने लगे हैं।

प्राचीन काल से ही बिहार ने लोकतंत्र, शिक्षा, राजनीति, धर्म एवं ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में देश को ही नहीं बल्कि दुनिया को मार्गदर्शन देने का कार्य किया है। लोकतंत्र के क्षेत्र में गणतंत्र, और शिक्षा जगत में नालन्दा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालयों की गाथा आज भी शिक्षा एवं ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपने स्वरूप की कहानी फक्र से कहते हैं, परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि यहाँ के किसानों को व्यापारियों तथा उद्योगपतियों की मर्जी से जीना पड़ता है।

सोचने की बात है की कैसे ठीक खेती के समय ही बाजार से खाद्य, बीज, कीटनाशक पदार्थ, डीजल आदि गायब हो जाते हैं और किसानों को महंगी कीमत पर काले बाजार से उन्हें खरीदना पड़ता है। इतना ही नहीं खाद, बीज, कीटनाशक आदि की नकली आपूर्ति की जाती है तथा डीजल में लेड की मिलावट की जाती है। दूसरी ओर विघुत का हाल बेहाल रहता है जिसके भरोसे खेती नहीं की जा सकती। इसका सीधा असर खाद्यान उत्पादन तथा कृषि यन्त्रों की बर्बादी के रूप में होता है।

गरीबी और कुपोषण की तो अपनी ही कहानी है बिहार में जहां सरकार इस आंकड़ को बाहर नहीं आने देना चाहती की आखिर बिहार में कितने बच्चे कुपोषित हैं? कुपोषण पर सरकार का मास्टर प्लान क्या है? कुपोषण रहित बिहार का निर्माण कब तक हो जायेगा? 

यह सवाल बेहद ज़रूरी हैं पर अफ़सोस की सरकार ये आंकड़े कभी बाहर आने ही नहीं देगी क्योंकि अगर ये आंकड़े बाहर आ जायेंगे तो सरकार के सारे वादों की पोल खुल जायेगी और नेताओं को अखबार के पहले पैन में यह पढ़कर अपनी कुर्सी जाती दिखेगी की ”बिहार में कुपोषण से 150 बच्चों की मौत”.

मुजफ्फरपुर में जो एक राजनीतिक मर्डर की गयी है जिसके हत्यार बिहार की व्यस्वस्था और लचरता है उसका एक प्रमुख कारण है गरीबी और कुपोषण जिसपर बात शायद काम हो और यह लाज़मी भी है क्योंकि अभी फिलहाल बच्चों की जान किसी भी हालत में बचाना बेहद ज़रूरी है पर फिर भी सच्चाई कभी न कभी परदे के बाहर आ ही जायेगी।

बिहार के लोग आज के समय में विशप्त हैं उन सभी अत्याचारों को झेलने के लिए जो इस सिस्टम में गढ़ा गया है. आज हम सवाल सिस्टम बनानेवालों से नहीं करके सिस्टम से ही करने लगे हैं और ढूंढने लगे हैं ऐसे जवाब जिसमे बिहार की उन्नति छुपी हो.

पर अफ़सोस! उस सवाल का जवाब मिलना नामुमकिन है जब तक हम सवाल के उस ढाँचे को नहीं सही करते..

 

लेखक : अमित आनंद 

 

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