आपातकाल यानी लोकतंत्र की हत्या को आज हो गए 44 साल

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”दांव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते” स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने इस कविता को आपातकाल के दौरान जेल मे लिखा था जिसमें उनके दृढ निश्चय को पहचाना जा सकता है और शब्दों में उन दिनों की ज्वाला भी देखी जा सकती है जब उनके जैसे और भी कई नेताओं को जबरन बंदी बना दिया गया था ताकि आपातकाल की साज-सज्जा में कोई कमी न रह जाए।

25 जून 1975 के इस तारीख का उल्लेख करते हुए वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आत्मकथा ”मेरा देश मेरा जीवन” में लिखा था कि इस दिन लोकतंत्र पर आज तक का सबसे ज़ोरदार प्रहार हुआ था और जिससे लोकतंत्र बुरी तरह चोटिल हुआ। 

राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की वो अनुच्छेद 352 यानी आपातकाल की घोषणा वाले अर्ज़ी पर हस्ताक्षर ने मानो  देश की दशा ही बदल कर रख दी। 

पत्रकारिता से लेकर राजनीती तक सभी ने अपना पर्याय बदल लिया, अखबार सादे पन्ने के हो गए जिसपर कुछ भी लिखना सरकार की रज़ामंदी पर आधारित था, लोगों का रेडियो पर सुनना भी इस भयंकर लोकतान्त्रिक हमले के दायरे में आ गया और रेडियो भी वही सुनाने लग गए जो सरकार चाहती थी जिसमें जनता और रेडियो प्रसारकों की कोई स्वयत्तता नहीं थी.

सन्न 1975 में देश भयंकर आर्थिक संकट से गुज़र रहा था जहाँ गरीबी और भुखमरी अपने चरम सीमा पर थी तो वहीँ जनसँख्या वृद्धि से देश में हाहाकार मचा हुआ था. 

गुजरात के एक शिक्षण संस्थान में बढ़ती मेस फीस को लेकर शुरू हुई आंदोलन ने तूल पकड़ा तो इसकी लहर बिहार तक पहुंच गयी जहाँ छात्र सड़कों पर उतर सीधे केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगी और लगे ललकारने इंदिरा सरकार को.

इस आंदोलन का परवान चढ़ना अभी बाकी था और शुरुआत हुई लोकनायक जयप्रकाश नारायण के समर्थन से जब छात्रों के एक समूह ने यह हामी भरी की इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व जयप्रकाश नारायण जी करें और इस आंदोलन का नाम सम्पूर्ण क्रान्ति दिया गया जिस आंदोलन को आगे बढ़ाकर उन्होंने केंद्रीय सियासत पर बैठीं इंदिरा गाँधी के विरुद्ध यह नारा दिया कि ”सिंहासन खाली करो की जनता आती है”.

आंदोलन गुजरात और बिहार से निकल अब देशव्यापी हो चुका था और इंदिरा सरकार को यह भय सताने लगी थी कि अगर यही दौर जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब आक्रोश का एक  हुजूम संसद में प्रवेश कर जाएगा। 

उन दिनों इंदिरा सरकारी मशीनरी का उपयोग कर चुनाव लड़ने के मामले में कानूनी लफड़ों से जूझ रही थीं और न्यायलय ने उन्हें 12 जून 1975 को इस मामले में दोषी ठहराया जिससे इंदिरा को अपनी अस्तित्व खतरे में नज़र आने लगी और इलाहाबाद कोर्ट ने उनके चुनाव लड़ने पर भी पाबंदी लगा दी.

बता दें कि सोशलिस्ट पार्टी के नेता राजनारायण सिंह ने 1971 के आम चुनावों में इंदिरा गांधी को उनकी सीट रायबरेली से हरा दिया था. 

इन सभी घटनाओं के बीच जयप्रकाश नारायण के आंदोलन ने उन्हें झकझोर दिया था और वे सोच में लग गयीं थी की आखिर डूबती हुई राजनीती को कैसे बचाया जाए, तभी उन्हें सहारा मिला उस समय के पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे का जिन्होंने इंदिरा को आपातकाल की सलाह दी और प्रधानमंत्री ने बिना झिझक के उस सलाह को मान लिया और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद लोकतंत्र को निलंबित कर दिया अर्थात देश में इमरजेंसी लागू कर दी गयी. 

सभी महत्वपूर्ण विपक्षी नेताओं को जेल भेजा जाने लगा जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चरण सिंह, मोरारजी देसाई, राजनारायण और सैंकड़ों नेता शामिल थे. 

सरकार की निरंकुश कार्यशैली पर सवाल करते हुए पत्रकारों ने भी सम्पादकीय पृष्ठ पर कुछ नहीं छापा और यह दिखा दिया कि दबाव में पत्रकारिता नहीं हो सकती और नतीज़तन पत्रकारों को भी जेल में डाला जाने लगा.

 19 महीने तक चले इस लोकतांत्रिक ह्त्या में सरकार ने यातनाओं की हद पार कर दी जहाँ एक ओर जबरदस्ती लोगों नसबंदी कराई जाने लगी तो वहीँ जेल में रहने के दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण की तबियत भी बिगड़ गयी और कई नेताओं और देशवासियों की भावनाएं आहत हुईं।

18 जनवरी 1977 को इंदिरा गाँधी ने नए चुनाव की घोषणा करते हुए सभी राजनितिक धुरंधरों को रिहा कर दिया। 23 मार्च को आधिकारिक रूप से आपातकाल हटा दिया गया और लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी दोनों ही चुनाव हार गए।  बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला और इसके पश्चात मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी सरकार भारी मतों से जीतकर सत्ता में आयी।  

जनता ने इस लोकतंत्र के हत्या को माफ़ नहीं किया और मां बेटे की जुगलबंदी को दूर रखने का ही फैसला किया।

आपातकाल की ज्यादतियों को जानने के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने शाह कमिटी का गठन किया, जांच आयोग ने नसबंदी कार्यक्रम पर सरकार के रवैये को निराशाजनक करार देते हुए कहा की सरकार ने इस इमरजेंसी के दौरान सरकार ने पटरियों पर और सड़कों पर रहने वाले गरीबों की नसबंदी कराई, और हद तो तब हो गयी जब ऑटो रिक्शा चालकों के लाइसेंस नवीकरण के लिए उन्हें नसबंदी सर्टिफिकेट दिखाना पड़ता था

वह दौर अमानवीय और अलोकतांत्रिक था। 

 

लेखक : अमित आनंद 

 

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