लापरवाही और लचरता के शिकार होते हमारे जवान

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सिनेमाघरों में 11 जनवरी 2019 को आदित्य धर द्वारा निर्देशित फिल्म URI आयी थी जिसे भारत में काफी लोकप्रियता मिली थी और लगातार 2 महीनों तक इस फिल्म ने सिनेमाघरों में अपनी धाक जमा कर रखी थी
फिल्म भारत द्वारा पाकिस्तान पर किये गए सर्जिकल स्ट्राइक के ऊपर आधारित थी। इस फिल्म में मेजर विहान सिंह शेरगिल ने कहा था की वे सेना के हर एक जवान को इस ऑपरेशन के बाद सुरक्षित लेकर आयेंगे और फिल्म के अनुसार ठीक उन्होंने वैसा किया भी और फिल्म में सेना एवं वायुसेना के पुरुषार्थ का भी प्रदर्शन किया था । फिल्म में एक और डायलॉग था जिसमे किसी जवान के शहीद होने के बाद उसे श्रद्धांजलि के समय वार क्राई की प्रथा थी और उसमें यह बोला जाता था कि ‘बलिदान परम धर्मः’ ।

अगर सेना के इस फिल्म में दिखाए गए हालात की तुलना जमीनी हकीकत से की जाए तो शायद यह शहीदों का अपमान करना होगा क्योंकि चाहे जवानों के प्रति नेताओं की टिप्पणी हो या उनके लिए मुहैया कराई जाने उपकरण, सभी बेहद निम्न किस्म के होते हैं जिसका सबूत आज यानी 11 जून 2019 या फिर अतीत में हुए गए घटनाओं में चिन्हित है ।
आज AN 32 का मलबा भारतीय वायु सेना के द्वारा अरुणाचल प्रदेश में ढूंढ लिया गया है जिसने 3 जून को असम के जोरहट एयरबेस से अरुणाचल प्रदेश उड़ान भरी परन्तु कुछ समय बाद ही वो रडार के रेंज से गायब हो गया और जिसने हमारे देश के होनहार 13 वायुसेना जवानों को भारत से छीन लिया।

आज उस विमान का मलबा मिला है और यह बात भी स्पष्ट हो चुकी है कि शायद ही उसमें से कोई बच पाया हो
अब अगर फिल्म उरी पर वापस लौटें तो कुछ सवाल हैं जो फिल्म देखने के बाद उस फिल्म पर वाहवाही लुटने और हाउ इस द जोश का जायजा लेने वाली सरकार से की जा सकती है कि क्या सरकार फिल्म की तर्ज़ पर जवानों को यह भरोसा नहीं दिला सकती की उनका परम धर्म देश की रक्षा करना है और बदले में उनकी जान की रक्षा की सरकार गारंटी देती है?

क्या सरकार बलिदान से पहले सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती?

AN 32 विमान की अगर बात की जाये तो विमान के खामियों की लिस्ट से शायद जवानों से लेकर लोगों तक के सिर भी झुक जाएँ पर एक सिर जो हमेशा खड़े रहकर जवाबी कार्रवाई करेंगे वे होंगे नेताओं के सिर जो अपने ऊपर उठ रहे सवालों पर लोगों को काटने दौड़ेंगे।

बता दें की AN 32 एक 40 साल पुरानी विमान थी जिसने सन् 1976 में अपनी पहली उड़ान भरी थी।

3 जून को जिस AN 32 ने जोरहट से उड़ान भरी थी उसका इमरजेंसी ट्रांसमीटर लोकेटर जो की आपातकाल के समय सन्देश भेजते हैं वे पिछले 14 सालों से उपयोग में नहीं थे और ये लोकेटर इतने पुराने हो चुके थे की इनका उत्पादन करने वाली कम्पनी ने भी इसे बंद कर दिया था जिस वजह से इसे ढूँढना और भी मुश्किल हो गया था।

अब सवाल ये उठता है की आखिर इतने पुराने विमान से जवानों को कैसे भेजा जा सकता है और इसमें किसकी लापरवाही है? और ये लापरवाही भी तब बरती गयी जब ठीक 10 साल पहले ऐसे ही AN 32 विमान ने ठीक अरुणाचल प्रदेश के लिए ही उड़ान भरी थी और ठीक 13 जवानों को लेकर इसी तरह गायब हो गयी थी और उस दुर्घटना में भी 13 जवान मारे गए थे।

लापरवाही और लचरता से हमारे जवानों की जान जाना एक आम बात हो गयी है, जिसका जवाब ना आप हुक्मरानों से उम्मीद कर सकते हैं और न ही ज्यादा दिनों तक इस सवाल के साथ जी सकते हैं क्योंकि नेताओं ने तो कई बार बयान भी दे दिया है कि ‘जवान तो होते ही हैं मरने के लिए’।

पर भारत में इन जवानों के बदौलत खुद को सुरक्षित महसूस करने वाले लोगों को कम से कम समय निकाल कर ऐसी ही तमाम घटनाओं के बारे में पढना चाहिए एवं मूल्यांकन करना चाहिए की जवानों जान ज्यादा कीमती थी या सरकार के वो चुनाव और भारी भरकम सुरक्षा बजट ।

 

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