बंगाल के लोग आखिर कैसे राज्य की कल्पना करें?

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Mamta Banerjee
Mamta Banerjee

पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने जून 1947 में ब्रिटेन में अमेरिकी राजदूत को बताया था की बंगाल भारत या पाकिस्तान में न मिलकर एक अलग राष्ट्र होने का भी काम कर सकता था.

अंग्रेजों की यह नीति रही थी कि फूट डालो और राज करो, गोरों की इसी नीति का नतीजा था की भारत और पाकिस्तान अलग हुए जिसमें उन्होंने एक समय में तीसरा राष्ट्र यानी बंगाल को भी रखने की कोशिश की थी.

‘कलकत्ता’ जिसे ब्रिटिश भारत के मुकुट में एक गहना भी कहा जाता था और उस समय कलकत्ता गोरों का चहेता हुआ करता था क्योंकि यह उनके खजाने को आयात निर्यात के माध्यम से बढाने का एक जरिया था.

विभाजन के जिस बीज को गोरों ने आजादी के समय बोना चाहा था वो उस समय तो न हो सका, परन्तु आज के समय में विभाजन की स्थिति जैसी तो नहीं लेकिन उससे बहुत कम भी नहीं है.

बंगाल की जनता टकराव और वर्चस्व की लड़ाई को बड़ी करीब से देख रही है और उम्मीद कर रही है की    हुक्मरानों की सनक कब ठंडी पड़े और राहत की सांस के रूप में वे अपना काम फिर से शुरू कर सकें

2019 आम चुनाव में खून और मारपीट ने अपनी छाप ईवीएम पर छोड़ी तो जनता ने भी परिणाम के माध्यम से बता दिया की बन्दूक की नोंक पर एजेंडे चलाये जा सकते हैं पर जनता और सरकार नहीं.

ममता और केंद्र सरकार की हालिया लड़ाई कोई नयी बात नहीं है बल्कि 2014 चुनाव परिणाम से ही इसकी नींव गढ़ी जाने लगी थी और केंद्र में बैठी भाजपा सरकार ने भी यह मान लिया था की अगर कलकत्ता फतह करनी है तो आर- पार की लड़ाई के साथ ममता को कलकत्ता की गद्दी से उठा फेंकना होगा.

सीबीआई और पुलिस की खुल्लम खुल्ला लड़ाई से लेकर योगी आदित्यनाथ को कोलकाता में रैली न करने देना उन सभी दावों पर मुहर लगाती है जो इस बात की पुष्टि करती है कि कोलकाता में अब आर पार की लड़ाई शुरू हो चुकी है.

इधर भाजपा ने अमित शाह के रूप में अपना धडा तैयार किया है तो उधर ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर को भाजपा की लहर कम करने के लिए तैनात किया है.

अगर लड़ाई जगजाहिर हो चुकी है तो इस बात को भी मानना होगा की ममता ने अपने राजनीति में कहीं ना कहीं हठ,तानाशाही और इज्ज़त को पनाह दे रखी है जिससे वो बंगाल का विभाजन राजनितिक पार्टियों के आधार पर करना चाह रही हैं.

हठ की बात करें तो सीबीआई का मामला सामने आता है जब सारी मर्यादाओं को ताख पर रख केंद्र से भिड़ने का एकमात्र तरीका उन्होंने धरने के रूप में अपनाया जहाँ राज्य पुलिस का समर्थन ले वे ललकारने की राजनीति करने लगीं.

तानाशाही की बात करें तो बिहार के लोगों को पीटने और कोलकाता से भगाने के मामले में कुछ ना बोलना और लगे रहना अपने राजनीतिक साम, दाम, दंड, भेद में, यह इस बात को दर्शाता है की तानाशाही की भले ही उन्होंने सरेआम नुमाइंदगी नहीं की परन्तु मन और काम में साफ़ दिखा दिया उन्होंने.

हांलाकि तानाशाही का तमगा महाराष्ट्र के राज ठाकरे और अन्य उन सभी राज्यों के नरेशों को दिया जा चुका है जो अपने राज्य को बपौती मानते हैं और भारत जैसे संघीय देश की भावनाओं एवं अखंडता को खंडित करते हैं.

‘चिकित्सक इलाज़ करते करते अचानक से सड़क पर आ गये और हड़ताल करने लगे’ कुछ ऐसा ही कहना चाह रहीं है ममता सरकार, कि कोलकाता में डॉक्टरों को लेकर जो भी बखेड़ा खड़ा हुआ है उसमें राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं है और न तो वे डॉक्टरों से माफ़ी मांगेंगी और ना ही ये आश्वासन देंगी की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार वहन करेगी.

यह जाहिर है की ममता सरकार ने इस मुद्दे को संवेदनहीनता के साथ हैंडल किया है जिसका खामियाजा जनता को भोगना पडेगा.

आगे आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा की ममता सरकार बंगाल को राजनीतिक मुद्दों पर कैसे जीतती हैं और भाजपा के असर को कम करती हैं.

तब तक राजनीतिक पार्टियों की तरफ से बंगाल का विभाजन जारी है…..

 

लेखक- अमित आनंद 

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