सुशासन बाबू के तमगे पर कब तक बैठे रहेंगे नीतीश?

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MUZAFFARPUR DEATH
MUZAFFARPUR DEATH

नीतीश कुमार के कॉपीराइट कहे जाने वाले सुशासन बाबू का तमगा अगर उन्हें लगभग 5 सालों से राजनीतिक सहायता पहुंचा रहा है, तो इस बार मुजफ्फरपुर के हालात को देखते हुए उनके तमगे को बदलने की ज़रुरत है, ताकि उन्हें अपनी कार्यशैली में बदलाव करने का मौका भी मिले और जनकल्याण के लिए जरूरी नियत भी.

मुजफ्फरपुर की धरती अगर बच्चों की लाशों से भर जाए तो यह तमाचा है उन सभी अधिकारियों और नेताओं के मुंह पर जो स्मार्ट सिटी के नाम पर जनता से भारी भरकम वोट देने की मांग करते हैं.

हर साल मुजफ्फरपुर की ऐसी बीमारियाँ बिहार के अस्तित्व पर वो काली स्याही है जिसको मिटाने की कोशिश करते करते शायद सफेदपोश मैले हो जाएँ और जनता से किये गए वादों का एक अध्याय भी ख़त्म हो जाए.

आज मुजफ्फरपुर में मरते बच्चों को देखकर आम लोगों को यह अहसास तो हो ही गया है की चाहे राज्य कितनी भी तरक्की कर ले, कितनी भी स्मार्ट सिटी बिहार के अन्दर समाहित क्यों ना हो जाए, लेकिन जो नियति नेताओं ने गढ़ी है उससे उबर पाना नामुमकिन है.

लगभग 100 मौतों के बाद बैठक पर बैठक हो रहे हैं रोकथाम को छोड़कर उन सभी मुद्दों पर चर्चे हो रहे हैं जिसका सम्बन्ध इन मौतों से शायद ही है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन दिल्ली से उड़कर मुजफ्फरपुर पहुंचे तो भगवान ने भी ठान ही लिया कि 5 जानें और लेंगे और दिखा देंगे मंत्री जी को कि हालात कितनी भयावह है, और इसी तरह 5 बच्चों ने मंत्री जी के अस्पताल में रहते ही अपना दम तोड़ दिया.

अब इन मौतों से मंत्री जी को फर्क पड़ा या नहीं इसका अंदाजा तो बैठक दौरान मैच के स्कोर की जानकारी लेना ही बता देता है.

अब रविवार के छुट्टीवाले दिन मंत्री जी मुजफ्फरपुर पहुँच गए तो इसका मतलब ये तो नहीं है न की दिनभर वो बस मुजफ्फरपुर के समस्या के बारे में ही चिंतित रहेंगे, इसलिए उन्होंने सोमवार को संवाददातों को साफ़ शब्दों में कह दिया की एक मुद्दे पर वो बार बार नहीं बोलेंगे और मुजफ्फरपुर के सवाल पर कोई टिप्पणी भी नहीं करेंगे.

इधर मंत्री श्याम रजक को लगता है कि यह कोई बड़ी बात नहीं है और इस मुद्दे का कद इतना भी बड़ा नहीं हुआ है की बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वहां पहुंचे और लोगों की समस्याएं सुनें.

मुजफ्फरपुर में जो भी अमंगल और अपूर्णीय क्षति हो रही है उसपर बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने पहले तो दिल्ली में हो रहे पार्टी के कार्यक्रम को तरजीह दी और जब वहां के कामों को निपटा लिया तो फिर थोडा समय बिहार को देते हुए उन्होंने कहा की वो मानते हैं कि जागरूकता की अभाव के कारण यह इतनी बड़ी बिमारी बनकर उभरी है.

उन्होंने संसाधनों की कमी पर तो कोई बयान नहीं दिया पर 6 अतिरिक्त एम्बुलेंस देने की घोषणा करके बिना बोले ही मुहर लगा दिया.

चिकित्सकों ने भी शांत रहते हुए हाथ खड़े कर दिए हैं जिसका असर मौत के आंकड़ों पर पड़ रहा है 

24 जून को एक सुनवाई होनी है, सामाजिक कार्यकर्ता तमन्ना हाशमी ने मुजफ्फरपुर सीजेएम कोर्ट में एक केस दर्ज कराया है जिसमें उन्होंने यह आरोप लगाया है की स्वास्थ्य मंत्रियों के नज़रंदाज़ वाले रवैय्ये के कारण ही 100 से अधिक बच्चों की मौत हुई है.

यह ऐसा पहला मौका नहीं है जब किसी राज्य में ऐसे भयानक स्तर पर बच्चों की मौत हो रही है बल्कि उत्तरप्रदेश भी ऐसी ही त्रासदी से गुजर चूका है जिसका इलाज़ वहां की सरकार ने समय रहते निकाल लिया और अपनी साख एवं बच्चों की ज़िन्दगी को भी बचा लिया.

वहां भी ऐसी ही त्रासदी 2017 में आई थी जहाँ करीब 500 बच्चों ने जापानी इन्सेफेलाइटिस के कारण दम तोड़ दिया था पर वहां की सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए WHO और UNICEF की मदद से एक्शन प्लान 2018 बनाया और इस बिमारी के टीके को प्रचंड स्तर पर राज्य में प्रवाहित करवाया ताकि और बच्चों की जान न जा पाए, और इसी का नतीजा था की अगले साल यानी 2018 में इस बिमारी में दो तिहाई की भारी गिरावट दर्ज की गयी.

यहाँ नीतीश कुमार को भी ऐसा ही कदम उठाना होगा ताकि मुजफ्फरपुर बच्चों की मौत का कब्रगाह और न बने.

अभी मुजफ्फरपुर में इस त्रासदी को हुए करीब 5 दिन गुज़र गए हैं और 100 से ज्यादा जान भी जा चुकी अब इन 5 दिनों और 100 से ज्यादा जान की कीमत सरकार अपने काम में किस तरह अदा करेगी यह तो देखने वाली बात है, और पुरे बिहार की जनता चाहे वह किसी भी विचारधारा, किसी भी राजनीतिक पार्टी का हो कम से कम इस मुद्दे पर नीतीश कुमार की जीत चाह रहा है.

बाकी केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने मुजफ्फरपुर की घटना के दोषी को कठोर सज़ा देने की बात कही है.

 

लेखक : अमित आनंद 

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