क्या है RTI संशोधन बिल ? जानें विस्तार से

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साल था 2005 जब उसे आज़ाद घोषित किया गया था, वह आज़ाद था सवाल पूछने को, वह आज़ाद था डपटने को कि आखिर इतनी देर क्यों कर रहे हो?, वह सूचना के क्षेत्र में सर्वोपरि था, वह सूचना का अधिकार अधिनियम था जिसे RTI यानी राइट टू इनफार्मेशन एक्ट भी कहते हैं।

सरकारें आयीं सरकारें गयीं, कितनों की साख पर इस सूचना के अधिकार ने डंक मारा पर यह अछूत था किसी बदलाव से, किसी ऊँगली से।

इस लोकसभा सत्र में सरकार ने इस आरटीआई एक्ट पर कुछ संशोधन करना चाहा, सरकार rti संशोधन बिल लायी, दोनों सदनों में प्रस्ताव रखा गया और बस कुछ वरोध हुए लेकिन साइड से निकल सरकार ने इस बिल को पास कर लिया।

अब बिल राष्ट्रपति के पास जायेगी जहाँ उनकी सहमति के बाद यह संशोधन कानून में तब्दील हो जाएगा।

क्या है RTI बिल?

RTI यानी सूचना का अधिकार अधिनियम जिससे आप किसी भी सरकारी कार्यालय से सूचना इकठ्ठा कर सकते हैं, यह बिल आम आदमी को सूचना के क्षेत्र में मज़बूत बनाता है, इस बिल को संसद ने 15 जून 2005 में लागू किया था और इसके बाद से कितनों की पोल पट्टी इस सूचना के अधिकार अधिनियम ने खोली।

आरटीआई अधिनियम में यह प्रावधान है की शिकायतकर्ता को 30 दिनों के भीतर अगर सूचना प्राप्त नहीं होती है तो वह मुख्य सूचना आयुक्त के पास इसकी शिकायत कर सकता है जिसकी तर्ज़ पर मुख्य सूचना आयुक्त अगर चाहे तो वह किसी भी सरकारी कार्यालय को फटकार लगा सकता है देर करने की वजह से और इसपर ठोक सकता है जुर्माना भी।

मुख्य सूचना आयुक्त का पद बिलकुल स्वतंत्र है सभी सरकार, सभी मंत्रियों से ऊपर।

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क्या है RTI संशोधित बिल

RTI संशोधन बिल RTI बिल का अगला वर्जन है जिसमे इस बिल के सेक्शन 13 एवं 16 को संशोधित किया गया है . इन संशोधन की अगर मोटे तौर पर बात की जाए तो पहले जो सूचना आयुक्त 5 साल के लिए नियुक्त किये जाते थे अब वह सरकार के हाथ में होगी मसलन अब नियुक्ति से लेकर सूचना आयुक्त की पगार तक सब केंद्र सरकार तय करेगी जबकि पहले इन मुद्दों में केंद्र सरकार का कोई हाथ नहीं होता था।

अब पगार पर रौशनी डाली जाए तो पहले के मुताबिक़ मुख्य सुचना आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की पगार बराबर थी लेकिन अब यह केंद्र सरकार के हाथ में है, मतलब साफ़ है की मुख्य सूचना आयुक्त के गाडी की ड्राइविंग सीट पर अब केंद्र सरकार है जो जिस गति में चाहे गाडी को चला सकती है।

संशोधन करने की सरकारी दलील 

सरकार ने आरटीआई संशोधन में एक जो सबसे महत्वपूर्ण दलील दी है वह यह की इससे लोगों को सुचना पाने में आसानी होगी, अब हड़बड़ में भी समझें तो इतना तो समझ ही सकते हैं की आसानी तो छोड़ ही दें सूचना मिलेगी भी या नहीं इस बात पर भी संदेह है।

दूसरे दलील या यूँ कहें की चीफ इलेक्शन अफसर के बराबरी वाले मुद्दे पर सरकार ने अपना बचाव करते हुए तर्क दिया है कि चीफ इलेक्शन अफसर एक संवैधानिक पद है और मुख्या सूचना आयुक्त एक कानूनी पद।

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संशोधन के खिलाफ दलील 

इस संशोधन बिल के खिलाफ यह दलील आयी की सरकार अब इसे अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करेगी, सरकार इसकी स्वायत्तता को ख़त्म कर रही है और अब सूचना पाना आसान नहीं रहेगा।

फिलहाल, बिल संसद के दोनों सदनों में पारित हो गयी है और अब राष्ट्रपति महोदय इस बिल पर हस्ताक्षर कर इसे क़ानून में तब्दील कर देंगे।

 

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