आखिर शिक्षा व्यवस्था पर सवाल कौन करेगा?

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विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का कहना था की “शिक्षा तथ्यों को केवल सीखना ही नहीं बल्कि सोचने के लिए मन और दिमाग की प्रशिक्षण है”, परन्तु हमारे भारत में आज शिक्षा की परिभाषा और उसका मतलब जानने से पहले ये जानना ज़्यादा आवश्यक हो गया है कि शिक्षा सही तरीके से ग्रहण करना सबसे पहला अवसर होना चाहिए।

भारत के प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च-स्तरीय विश्वविद्यालय तक के हाल में ज़्यादा का फर्क नहीं है। किसी भी देश के शिक्षा व्यवस्था से यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि उस देश का आर्थिक, राजनीतिक एवं जागरूकता का क्या स्तर होगा।
शिक्षा में नीजिकरण समाज को विभिन्न हिस्सों में बांटने का काम करता है, भारत में सरकारी और निजी विद्यालयों में आकाश और ज़मीन का फर्क नज़र आता है. चाहे वर्ग के हालत हों या शिक्षकों के पढ़ाने का तरीका दोनों ही अक्सर एक सामान होता है, ऐसे में कम आमदनी होने वाले परिवार भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजना ज़्यादा मुनासिब समझते हैं। निजी विद्यालयों के मासिक शुल्क का सितम कभी-कभी इन परिवारों पर इतना भारी पड़ता है कि कभी इन्हे अपनी उपजाऊ ज़मीन गिरवी रखनी परती है तो कभी भूखे पेट सोना पड़ता है। आज़ादी के 72 सालों के बाद भी यह हाल लगभग हर जगह है।

करोड़ों के शिक्षा बजट और शिक्षा के नाम पर किये गए तमाम वादे हर साल अपडेट किये जाते है पर सरकारी स्कूलों में शिक्षक के अपडेट का कोई प्रोग्राम नहीं है जिससे हालात और बदतर हुए जा रहे हैं.

अगर सरकारी स्कूलों के हालात की समीक्षा सुबह 10 बजे के बाद की जाए तो वहाँ बच्चे अपनी पाठशाला को छोड़ मिलते है या तो चापाकल पर मिड डे मील के लिए पानी भरते या फिर कोई अन्य काम जिसका जुडाव मिड डे मील से होता है और शिक्षा के सितारे को लगा दिया जाता है सरकारी रेस्टोरेंट में खाना परोसने के लिए.

कागज़ात और जमीनी हक़ीक़त भी कभी एक दूसरे से रूबरू नहीं होते, कागजी तौर पर ऐसे अनेकों योजनाएं बनाये गए हैं जिसके आधार पर राजनेता खुद को योग्य साबित कर देते हैं पर ज़मीनी हक़ीक़त के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता, भारत को विश्व गुरु बनाने का सपना देखने वाले अगर कभी इन शिक्षा और रोज़गार के लिए भी सपना देख लेते तो शायद विश्वगुरु बनने का सपना हर भारतीय का पहला सपना होता।

शिक्षा में कमज़ोरी का मतलब है देश के भविष्य को कमज़ोर करना है, परन्तु अफ़सोस कि बात है कि ‘छात्र’ जिन्हे देश का भविष्य कहा जाता है, शिक्षा से बहुत दूर बिठाये गए हैं। किसी भी गांव या समाज में एक सरकारी विद्यालय होने का क्या फायदा है यह वहीं के लोग समझ सकते हैं, भारतीय परिवारों में अधिकतर किसान, मज़दूर, इत्यादि हैं जो अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में भेजते हैं, सोचने वाली बात है कि जहाँ इन विद्यालयों में कोई भी योग्य व्यक्ति अपने बच्चों को भेजना नहीं चाहते वहीँ से इन किसानों और मज़दूरों के साथ-साथ भारत के भविष्य का निर्माण हो रहा होता है।
ये तो हुई सामाजिक रुप-रेखा, अब वक़्त है कुछ सवालों का-

1). भारत के भविष्यों पर चिंता जताने वाले सत्ताधारी शिक्षा व्यवस्था पर चुप क्यों?
2). शिक्षा के क्षेत्र में नीजिकरण क्यों?
3). शिक्षा पे सवाल उठाने वाले विद्यार्थियों को देशद्रोही और वामपंथी क्यों बताया जाता है?
4). मीडिया शिक्षा व्यवस्था पर दशकों से खामोश क्यों?

 

लेखक- अमित आनंद

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